Skip to main content

Posts

बढ़ता मनोबल बढ़ रहा है हौसला अब दिन-ब-दिन आतंकवादियों का बनाकर हमारी सेना को निशाना रुख कर रहे हैं उनके घरों का हो रहा है छलनी सीना इन हरकतों से जवानों का ऐसी हरकत परास्त कर रहा हिम्मत भी हमारे जवानों का कैसे करेंगें यह सामना इन आतंकी गतिविधियों का कैसे डटेंगे यह सीमा पर साहस और बुलंदी के संग गिरि हुई इरादों से अपने कर रहे हैं हमारा जड़ कमजोर होगा कैसे सुरक्षा देश का जब रक्षक हो जाए कमजोर होगा कैसे सुरक्षा देश का जब रक्षक हो जाए कमज़ोर चकनाचूर कर रहे है हौसलों का युद्ध से पूर्व ही कर रहे परास्त सरिता प्रसाद
Recent posts
Hii, I am happy to inform you about my new book. It’s preorder is now available on BooksCamel. Follow this link:  www.bookscamel.com/preorders/ safarkehamsafar Visit Facebook Page:  https://www.facebook.com/ Safar-Ke-Hamsafar- 593930180945434/ Visit Twitter Page:  https://twitter.com/ epumeshprasad

मेरा जीवन – आत्म कथा एक आम आदमी की

बलरामपुर में कॉलेज की स्थापना और उसके विकास के लिए मैंने अपना सबकुछ दाँव पर लगा दिया था। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मैं शिद्दत से यह महसूस करता हूँ कि कॉलेज के लिए मैंने अपने परिवार को भी अनदेखा किया। मेरे पीछे घर में मेरे वृद्ध पिता , श्री (अब स्वर्गीय) शिव नारायण साह , थे , घर के प्रति पूरी तरह समर्पित पत्नी , श्रीमती दमयंती देवी और मेरे पाँच-पाँच बच्चे थे। परिवार काफी बड़ा था। आर्थिक रूप से हम अपनी किराना की दुकान जो बलरामपुर हाट और टूँगीदीघी में स्थित थी पर आश्रित थे। बलरामपुर हाट स्थित दुकान तो कॉलेज के दुकान में शिफ्ट होने के कारण बंद ही हो गई थी , टूँगीदीघी स्थित किराने की दुकान भी मेरे ध्यान न देने के कारण बंद होने के कगार पर थी। मेरे वृद्ध पिता खुद अपना ध्यान रखने में असमर्थ थे भला दुकान कैसे चला पाते ! हाँ हमारे पास विरासत में मिली लगभग पचास बीघा खेती योग्य जमीन जरूर थी , जिस पर मुझे गुमान भी था और हमारी आय का अब एक मात्र स्रोत भी था। हालाँकि जमीन पिताजी के नाम थी और इसका बँटवारा अभी बाकी था। मेरे बड़े भैया श्री (अब स्वर्गीय) मथुरा प्रसाद ने जाने कितने ही बार जम...

मेरा जीवन – आत्म कथा एक आम आदमी की

संपादक की कलम से आत्मकथा साहित्य की एक बेहद जटिल और उससे कहीं ज्यादा जोखिम-भरी विधा है। जोखिम इसलिए कि ‘ आत्म ’ में हमें हमेशा   स्वयं से एक   तार्किक दूरी पर खड़ा होना होता है।   इसके लिए धैर्य और संयम बरतना आवश्यक है। आत्म कथा का लेखन शीशे के सामने खड़ा होकर खुद को निहारने जैसा है। आत्म कथा पढ़ने और सुनने का उद्देश्य किसी के बारे में जानना और समझना होता है। एक सम्मोहन और कौतूहल होता है दूसरे व्यक्ति के अन्तरंग संसार में प्रवेश पाने का। यदि वह व्यक्ति विशिष्ट रहा हो तथा कुछ ऐतिहासिक महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी भी , तो एक अनिवार्य किस्म की दिलचस्पी अपने सम्बन्ध में जगा लेने में सक्षम होता ही है , किन्तु यदि वह व्यक्ति नितान्त अविशिष्ट या बिल्कुल मामूली भी हो तो भी उसे समझने का हमारा एक अन्तहीन कौतूहल होता है और उसकी तुष्टि निःसंदेह आत्मकथाएँ करती हैं। अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में कोई व्यक्ति कौन से मोह को पालता रहा , कैसी भावनात्मक अनुभूतियाँ उसने खोई और पाई , किन पूर्वाग्रहों , मूल्यों , विश्वासों , परम्पराओं और आग्रहों पर वह बल देता रहा , किन भावुक आत्मीय क्षणों ,...
Umesh Prasad 12 August  ·  ABOUT EDITOR To edit a book is not and never be an easy task specially when there presence the need to write and rewrite the whole book apart from doing job of an editor. Since the book contains the story of my father it was a natural choice for me. Starting from the story of a common man to a man of substance I, myself, have seen my father struggling in every walks of life. Hence, when the proposal came to me I started writing and rewriting my own view about my father, that concluded to be a book in itself. Even the editor does not know how and when the Editor of the book became the “De – facto’ writer of the book. For those who know the editor of the book, i.e. the poor ‘Umesh Prasad’, he is best known as “Jack of all trades” but “perhaps master of none”. Here he tried to edit the book but in course of time started writing on behalf of the writer, i.e., Dr. Rajeshwar Prasad. Whether and how much I am succeeded in this effort is matter of...